मौलाना मोहम्मद अली जौहर, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और बैतुल मुक़द्दस

 

 

 

 

 

 

जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) के एक संस्थापक और पहले कुलपति,  मुजाहिदे आज़ादी मौलाना मोहम्मद अली जौहर 10 दिसंबर 1878 को रामपुर (उत्तर प्रदेश) में पैदा हुए थे। जनवरी 1 9 31 को उनका निधन हो गया। उनका कफ़न-दफ़्न उनके दोस्तों और रिश्तेदारों की सलाह से बैतुल मुक़द्दस (यूरोशलम,  इस्राइल द्वारा अधिकृत फिलस्तीन) में हुआ। उनका निधन उस समय हुआ जब वे लंदन में ‘गोलमेज़ सम्मेलन’ में भाग ले रहे थे और भारत को आज़ाद करने के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को राज़ी करने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने अपने अंतिम भाषण में कहा था कि अगर उनका देश स्वतंत्र नहीं हुआ तो वे भारत में जीवित वापस नहीं जायेंगें।

मौलाना ने इसी सम्मेलन में अंग्रेज़ों  को संबोधित करते हुए यह भी कहा था कि “यदि आप हमें स्वतंत्रता नहीं देते हैं तो आपको मुझे एक क़ब्र का स्थान देना होगा।” एक और अवसर पर मौलाना ने साम्राज्यवाद को ललकारते हुए कहा था:

दौरे हयात आयेगा क़ातिल क़ज़ा के बाद
है इब्तेदा हमारी तेरी इन्तहा के बाद

यह स्पष्ट है कि उस समय भारत को स्वतंत्रता मिलने का तो कोई सवाल ही नहीं था क्योंकि ना तो अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का संतुलन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ था, और ना ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं को संगठित कर इतना शक्तिशाली बना पाया था कि वो अंग्रेज़ों को भारत छोड़ कर चले जाने पर मजबूर कर दे। अक्टूबर 1917 में रूसी ज़ार शाही के ख़िलाफ़ व्लादिमीर लेनिन के  नेतृत्व में ‘महान समाजवादी क्रांति’ हो चुकी थीजो दबे कुचले लोगोंमज़दूरों और किसानों की राजनीतिक शक्ति की एक प्रतीक बनकर विश्व स्तर पर उभरी थी। इस क्रांति का ही नतीजा था कि आगे चलकर सोवियत संघ की बहादुर सेना और जनता ने अपनी दो करोड़ जानों का अनमोल बलिदान देकर जर्मन फासीवादी अडोल्फ़ हिटलर और उसकी सेना से  सोवियत संघ की भूमि पर लड़ते हुए उनको मौत के घाट उतारा और दुनिया को फासीवाद/फ़ाशिज़म से निजात दिलाई। इसके बाद उसी समाजवादी क्रांति ने अपनी पूरी ताक़त के साथ ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दियादुनिया भर में जारी स्वतंत्रता आंदोलनों की मदद और उनकी सफलता के लिए खुद को समर्पित कर दिया। भारतीय क्रांतिकारियों ने भी रूसी क्रांति के नेताओं से अपने संबंध बनाये। प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता एम एन राय तो लेनिन के करीबी सहयोगियों में थे और उन्हें चीन में क्रांतिकारी पार्टी बनाने की जिम्मेदारी भी दी गई थी, उपेंद्र प्रताप ने 1918 में रूसी शहर पेटरोगराड में लियोन ट्रोट्स्की से मुलाकात की थी।

इसके अलावा हमारे गौरवशाली क्रन्तिकारी विद्वान मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी 1922 में कप्तान ज़फ़र ऐबक और अन्य सहयोगियों के साथ लम्बा सफ़र तय करने के बाद मास्को पहुंचे थे और रूसी क्रांतिकारियों के साथ मुलाक़ातों के दौरान भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने में उन से मदद माँगी थी। मौलाना सिंधी ने मास्को में लगभग दस महीने गुज़ारे और वहॉ समाजवादी क्रांति के दर्शन का गहन अध्ययन किया। कप्तान ज़फ़र एबक ने अपनी यादों में एक दिलचस्प घटना का उल्लेख किया। वह लिखते हैं कि “उबैदुल्लाह सिंधी जब हज़ारों मील का पैदल सफ़र तय कर के मास्को पहुंचे तो उनके दोनों पैर ज़ख़्मी हो गए थे और उनके पैरों पर सूजन आ गयी थी। लेनिन की बीवी, किप्स्काया ने गुनगुने पानी में नमक डाल कर उबैदुल्लाह सिंधी के पैर धोये और मरहम पट्टी की।” (उल्लेखनीय है कि मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी का भी जामिया मिल्लिया इस्लामिया से करीबी रिश्ता रहा है।)

बहर हाल,  मौलाना मोहम्मद अली जौहर का स्वास्थ्य जेल में सज़ाऐं काटने के कारण बहुत ख़राब हो गया था। जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना के एक ही साल बाद 1921 में ब्रिटिश हुकूमत ने ‘ख़ालिक़ देना हाल’ कराची में एक अदालत लगा कर मौलाना को ढाई साल तक कराची जेल में रखने की सज़ा सुनाई। यूँ तो वे सरकार विरोधी गतिविधियों के अपराध में बहुत बार जेल जा चुके थेलेकिन आख़िर मे शूगर की बीमारी की तीव्रता और जेल में उचित आहार की कमी के कारण उनका स्वास्थ्य तेज़ी से गिरता चला गया और इस तरह वह 53 वर्ष की छोटी सी आयु में बहुत कुछ कर के इस दुनिया को अलविदा कह गए। उन ही का एक शेर है:

है रश्क एक ख़ल्क़ को जौहर की मौत पर
ये उसकी देन है जिसे परवरदिगार दे

बैतुल मुक़द्दस में मौलाना की क़ब्र पर जो पत्थर लगा है,  उस पर लिखा है,  “यहॉ मुहम्मद अली हिंदी (भारती) आराम फ़रमा रहे हैं”।

मौलाना के निधन पर स्वतंत्रता प्रेमी नामवर व्यक्तियों ने उनको अपने अपने अंदाज़ में भाव भीनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी। अरब दुनिया के प्रसिद्ध कवि अहमद शौक़ी ने मौलाना का मर्सिया अरबी भाषा में लिखा जिसके ऐक शेर का मतलब कुछ यूं है, “ खुदा के ज्वारे रहमत में सो जाना तुम्हारे लिए कोई अजीब बात नहीं है, तुम तो उस घर के साये में हो जिसके तुम एक फर्द थे।“

कुछ दिन पहले भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस्राइली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के निमंत्रण पर इस्राइल की यात्रा की थी, लेकिन न तो नरेंद्र मोदी को यह शर्म आई और न ही भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह आश्वस्त किया कि मौलाना मोहम्मद अली जौहर की क़ब्र पर भारतीय  प्रधान मंत्री खुद या उपने किसी प्रितिनिधि द्वारा फूलों का एक गजरा या एक चादर ही चढ़ा दें, और क़ब्र के सामने खड़े हो कर 120 करोड़ भारतियों की तरफ से स्वतंत्रता संग्राम के इस बहादुर जनरल को सलामी दें। नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति से ऐसी कोई आशा रखना तो अंग्रेजी की उस कहावत की तरह है जिस में ऐसी आशा रखने वाले को मूर्खों का स्वर्ग या स्वयं को धोके में रखने वाला कहा जाता है। मोदी का संबंध तो खुद ही उस विचारधारा और उस ‘परिवार’ से है जिसके आदर्शों में हिटलर और ब्रिटिश साम्राजय से वफ़ादारी की एक प्रमुख भूमिका है। मोदी की इस सोच में आज़ादी के मतवालों और जांबाज़ों का भला क्या महत्त्व हो सकता है चाहे उनका संबंध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से रहा हो या आज उनका संबंध इस्राइल के विरुद्ध फ़िलस्तीनी स्वतंत्रता आंदोलन से हो।

वर्तमान स्थिति यह है कि विश्व पूंजीवादी व्यवस्था जिसका नेतृत्व अमरीका कर रहा है, उसका आंतरिक संकट दिन प्रतिदिन गहरा और भयानक होता चला जा रहा है जिसके नतीजे में हर तरफ़ नरसंहार, युद्ध, अमरीकी हथियारों की बिक्री, इस्राइली हथियारों का निहत्थे फिलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल और आतंकवाद का बाजार गर्म है। ग़रीबी, असमानता, बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ती चली जा रही है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तरों पर अमरीकी साम्राज्यवाद और उसकी समर्थक ताक़तों के विरुद्ध अवाम का विरोध और संघर्ष भी लगातार तेज़ होता चला जा रहा है।

साम्राजयवाद के अंतर्राष्ट्रीय सरग़ना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 6 दिसंबर 2017 को अपने एक फैसले के अनुसार बैतुल मुक़द्दस (यूरोशलम) को इस्राइल की राजधानी मानते हुए अमरीकी दूतावास को इस्राइली शहर तेल अवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने का हुक्म जारी कर दिया और पूरी दुनिया की अपील को ठुकरा दिया।

इस शर्मनाक फ़ैसले के ख़िलाफ़ दुनिया भर में ख़ास तौर पर अधिकृत फ़िलिस्तीन में अवामी और सरकारी स्तरों पर ज़बरदस्त विरोध हो रहा है। साम्राज्यवाद विरोधी यह अवामी आंदोलन एक वैकल्पिक मोर्चे को जन्म देने के चरण में हैं जो इस बात का निश्चित संकेत है कि जल्दी ही एक नयी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का सूर्य उदय होगा और अधिकृत बैतुल मुक़द्दस व दूसरे फ़िलिस्तीनी भाग भी अमरीकी-इस्राइली गठजोड़ के क़ब्ज़े से मुक्त होंगें, संसार के विभिन देशों से तीर्थयात्री एक स्वतंत्र बैतुल मुक़द्दस की तरफ़ अपना सफ़र शुरू करेंगें और हम भारतीय नागरिक स्वतंत्रता संग्राम के इस शूरवीर, मौलाना मोहम्मद अली जौहर की क़ब्र के सामने खड़े होकर उनके उत्साह, दृढ़ संकल्प, साहस, त्याग, बलिदान और सेवाओं के लिये उनको अपना सलाम पेश करेंगें। यह जश्न का एक ऐसा अवसर होगा जिस में अधिकृत फ़िलिस्तीन की आज़ादी और मौलाना की क़ब्र पर हाज़री जैसी दोनों ही खुशियां शामिल होंगी।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया अलुम्नाई के लिए तो यह अवसर दुनिया के दूसरे लोगों से कुछ अलग ही होगा क्योंकि उस दिन वे अपनी मातृ संस्था के संस्थापक मौलाना मोहम्मद अली जौहर की क़ब्र पर श्रद्धांजलि अर्पित कर के अपने उस सपने को साकार करेंगें जिसे वे एक लम्बे समय से अपनी आँखों में बसाये हुए हैं।

मौलाना का शेर हैं:

लो वो आ पौहंचा जुनूँ का क़ाफ़ला

पाओं ज़ख़्मी, ख़ाक मुंह पर, सर खुले

मौलाना आने वाली नस्लों को अपना क्रन्तिकारी पैग़ाम देते हुए कहते हैं:

ये भी क्या पैरवी-ये-हक़ है के ख़ामोश हैं सब

हाँ अनल हक़ भी हो, मंसूर भी हो, दार भी हो

 मौलाना मोहम्मद अली जौहर ज़िंदाबाद

जामिया मिल्लिया इस्लामिया ज़िंदाबाद

बैतुल मुक़द्दस ज़िंदाबाद

(ग़िज़ाल मैहदी: भूतपूर्व अध्यक्ष, जामिया मिल्लिया इस्लामिया अलुम्नाई असोसिएशन, रियाद)