धर्म या स्वार्थ?

हाल ही में जिन घटनाओं से हम देशवासियों का साक्षात्कार हुआ, वह ना सिर्फ निन्दनीय है बल्कि प्रतिक्रिया मे अतिशीघ्र कड़े फैसले लेने योग्य भी । कुछ लोग इसे विपक्षियों की चाल बताते हैं तो कुछ सत्ता मे काबिज़ राजनेताओं के मद व बुरे नीयत का प्रतिक मानते हैं। चाहे जो भी हो,संलिप्तता तो नेताओं की है ही मगर जलता यह समूचा देश है – सांप्रदयिकता की आग में भाईचारे को सूली चढ़ाकर इंसानियत का गला घोंट कर।
मगर सवाल ये उठता है कि आखिर ये हो क्यों रहा है ? लोग तो कल भी भड़कते थे और आज भी भड़कते हैं , सांप्रदायिक सवाल कल भी उठते थे और आज भी उठते हैं , महिलाएं कल भी उतनी ही सुन्दर थी और आज भी सुन्दर हैं , अस्त्र-शस्त्र कल भी थे,आज भी हैं। मगर हमारे पास नहीं है तो वो है – धैर्य। आजादी के बाद से ही भारत पाकिस्तान मतभेद चलता आ रहा है। कारगिल के बाद इतना खून ना खौला तो आज क्यों पाकिस्तान के साथ मैच खेलने पर होने वाली बैठक को ना होने दिया जा रहा है । हम हमेशा से धैर्य रखकर फैसले शान्ति से लेने वाले लोग थे और हमारी नज़र मे पाकिस्तान इसके विपरीत। मगर इन हरकतों के बाद हममे और उनमें फरक ही क्या रह जाता है? सुना था कि हम सत्ता मे जाए तो ईंट का जवाब पत्थर से देंगे ये कैसा पत्थर? जवाब न्यायसंगत होना चाहिए जिसके लिए भारत विश्वपटल पर विश्वगुरु के नाम से जाना जाता था।
“पाकिस्तान” और “मुसलमान” इन दोनों शब्दों को हमारे नेताओं ने इस कदर जोड़ रखा है कि एक का नाम आते दूजा आ ही जाता है। मुसलमानों पर जैसी टिप्पणी आती है,क्या वो न्यायसंगत है ? अगर हाँ,तो यही टिप्पणी आपको तब क्यों नही आई जब श्री अब्दुल कलाम जी ने अग्नि मिसाइल बनाकर हमारे हाथों को सुरक्षा की दृष्टिकोण में सबल बनाया था,जब जाहिर खान,पठान,सानिया मिर्ज़ा खेल स्तर पर राष्ट्र का गौरव बढ़ाने का काम किया था ; जब शहनाई मे विसमिल्लाह खान और तबले में उस्ताद जाकिर हुसैन ने प्रेम का राग गाया था, जब बॉलीवुड मे तीन खान विश्व प्रसिद्ध होते हैं, जब गायिकी मे “ए.आर.रहमान” ऑस्कर लेकर आते हैं,जब व्यापार की दुनिया का बादशाह अजीम प्रेमजी सामाजिक सद्भावना मे सबसे अधिक पैसे लूटा देते हैं..आदि आदि। तब तो हम सीना चौड़ा करकर कहते हैं कि ये भारतीय हैं। तब तो हम इन्हें हिन्दुस्तान व मुसलमान कहकर नहीं बांटते, तब तो हम इनकी प्रसिद्धि पर दिल में तकलीफ नहीं पालते, फिर आज क्यों ? क्योंकि हम स्वार्थी हैं ?
मेरी समझ से तो – हाँ! मेरा एक मित्र मुसलमान शब्द से चिढ़ता है मगर श्री कलाम जी के आकस्मिक निधन से आंसू उसके भी आए थे। शाहरुख़ की कोई फ़िल्म नही छोड़ता। आखिर क्यों ? इसका जवाब खुद से पूछिये|
आज जो मुद्दा उछल कर आ रहा है , वो ह ै- गोमांस का । कई बुद्धजीवियों ने कहा कि हिन्दू भी गोमांस खाते थे,तो कई विद्वानों ने इससे गलत साबित किया । मगर वो कहते हैं कि ना की धुआं उठा है तो आग तो लगी ही होगी । कुछ ऐसा सोचकर ही इन तथ्यों पर विश्लेषण के उद्देश्य से मैंने कुछ इतिहास की पुस्तको का अध्ययन किया, ये वही पुस्तकें हैं जिन्हें दिल्ली विश्विद्यालय ने अपने इतिहास के पाठ्यक्रम मे शामिल कर रखा है। इनके अध्ययन से जो जवाब मुझे मिला,उसे जानकर मैं हतप्रभ रह गया क्योंकि तब की घटना में भी मुझे सुगंध आती है तो सिर्फ – स्वार्थ की।अध्ययन मे मैंने पाया “सिंधु नदी के तट पर रहने वाले लोगों से लेकर गंगा के मैदान मे रहने वाले लोग (जिन्हे हिन्दू के नाम से जाना गया) गोमांस का सेवन किया करते थे। ये घटना तब की है जब बौद्ध एवं जैन धर्म का उद्भव हो रहा था। बौद्ध एवं जैन धर्म हिंसा विरोधी धर्म के रूप मे काफी तेज़ी से फैल रहे थे। साथ ही इनकी नीतियां हिन्दूवादी परम्परा से त्रस्त लोगो के लिए अमृतवर्षा का कार्य कर रही थी। इसीलिए लोग इन धर्मों के प्रति आकर्षित हुए। साथ मे जिस हिसाब से गोमांस का सेवन किया जा रहा था,उस हिसाब से आने वाले वक़्त मे हमारे कृषि-प्रधान समाज मे खेत जोतने के लिए ना गाय शेष रह जाते और ना ही बैल। ऐसे मे धर्म गुरुओं ने गौ को माता कहकर इसकी रक्षा शुरू कर दी । यह बिलकुल इसी प्रकार हुआ जैसे आजकल हम दीवारों पर भगवान की फोटो चिपका देते हैं और कह देते हैं कि- यहां न थूकें ।
हँसी तो उन लोगों पर आती है जो ‘मुसलमानों पाकिस्तान जाओ’ या ” हिन्दू राष्ट्र” जैसी बातें करके खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी कहते हैं । सबसे पहली बात-भारत के किसी नागरिक को नहीं लगता होगा कि भारत के संविधान की आधारभूत संरचना गलत है । शायद इसीलिए संविधान निर्माताओं ने संसोधन हेतु अनुसूची-368 देने के बाद भी यह कहा कि कोई भी तथ्य या घटना जो संविधान के आधारभूत संरचना के खिलाफ होगा,उसे “असंवैधानिक” मानते हुए संशोधन पर विचार तक नहीं होएगा ।
भारतीय संविधान की आधारभूत संरचना में – भारत एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र है । ऐसी स्थिति में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की सोच रखने वाले और किसी भी धर्म के लोगों को भारत से निष्काषित करने वाले राष्ट्रवादी हैं या राष्ट्रविरोधी, इसका फैसला उनके सुविवेक स्वयं कर ले तो काफी बेहतर होगा ।
निश्चित तौर से, इस लेख को पढने के बाद यह सवाल उठाया जाएगा कि लेखक पक्का मुस्लिम होगा, मगर मैं बता दूं- मेरा पूरा नाम – कुमार शुभम् शर्मा अपने टेबल के सामने राधा-कृष्ण व माँ सरस्वती की तस्वीर रखता हूँ, पक्का हिन्दू हूँ, लेकिन आतंकवादी नहीं, न ही लोगों को भड़काने वाला भटका हुआ हिन्दू हूँ, देश का नागरिक हूँ जिसका धर्म-ग्रन्थ गीता के साथ संविधान है, संविधान की कदर करके दोनों पहलू को देखने वाला हूँ, सिर्फ एक पक्ष को देखकर मरने-काटने पर उतारू न होने वाला- “एक जागरूक नागरिक हूँ ।”
बस इतना ही अपील करना चाहता हूँ कि दोषियों को सजा व निर्दोष पर अत्याचार न होने देने के लिए आगें बढें, चाहे वे किसी पंथ,संप्रदाय या धर्म के हों । जिस पवित्र गंगा में स्नान करके हम पवित्र होते हैं, उसमें सारे धर्म के इंसानों ने स्नान लिया है, जिन हवाओं में हम साँस ले रहे उन हवाओं को सबने ग्रहण किया है, जो अन्न हम खाते हैं वह किन-किन धर्म के लोगों के हाथों से होता हुआ आया है , यह किसी को नहीं पता…जब प्रकृति ने हममें कोई अंतर नहीं रखा, फिर हम क्यों रखें? बस प्रेम व सद्भावना की उम्मीद में!
जय हिन्द!