जीत लोक की अथवा तन्त्र की हार !

लोकतंत्र की आस्था का एक और पर्व बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों के घोषित होने के साथ ही समाप्त हो गया। भारतीय लोकतंत्र के परिपक्व होने का ढोल अब और तेज़ी से बजेगा। लोकतंत्र की जीत की खुश्बू को टीवी डिबेट में तलाशा जा रहा है। लेकिन इन तमाम शोर गुल के बीच, मैं संविधान के दरवाज़े पर लोकतंत्र की आत्मा को तिल- तिल कर दम तोड़ते हुए महसूस कर रहा हूँ ।

परिणाम चाहे जो भी हो एक बार फिर ‘तंत्र’ के मकडजाल में ‘लोक’ की हार हुई है। दल- बदलू नेताओं की जीत सत्ता के लिए सिद्धान्तों का खून, वोट के लिए विचारों की हत्या, जिताऊ परिस्तिथियो के निर्माण हेतु दबंगों को टिकट, vision documents के नाम पर सस्ती राजनीति, अपराधियों का राजनैतिकरण, जेल से चुनाव जीतते अपराधी, न्यायालय द्वारा चुनाव लड़ने से रोका गया व्यक्ति पार्टी अध्यक्ष या स्टार प्रचारक;आख़िर और कितनी नीचे आ सकती थी यह राजनीति?अगर फिर भी यह लोकतंत्र की जीत है तो मुझे यह जीत मंज़ूर नहीं है। कहते हैं – “बिहार जो आज सोचता है, देश उसे कल करता है’ तो क्या वाकई भारत अब इस रास्ते पर चलने वाला है?

श्रीमान एक बार फिर ‘लोक’ हार गया. जीत जाति की हुई, धर्म की हुई, बाप और बेटे की हुई, ‘गाय’ की हुई, स्वर्ण और अवर्ण की हुई, शैतान और ब्रह्मपिशाच की हुई, मगर ‘लोक’ तो आज भी सिसक रहा है। चुनावी फ़िज़ा से भय, बूख, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई जैसे मुद्दों को पर्दों के पीछे ढकेलनेमें कोई पार्टी नहीं बल्कि मानसिकता ज़िम्मेदार है। वह मानसिकता जो यह जानती है की सत्ता के दरवाज़े हुमेशा डूप्लिकेट चाबी से ही खुलते हैं. यह वही मानसिकता है जिसे मालूम है की अगर इन मुद्दों पर विमर्श प्रारंभ हुआ तो जवाबदेही सबकी तय होगी. बात निकली तो दूर तक जाएगी और फिर ‘हमाम’ में तो सभी नंगे हैं। इसलिए बात ‘गाय- गोबर’ , ‘तंत्र-मंत्र’, ‘कौवा- कुत्ता’ के इर्द गिर्द चलती है।

इस परिणाम से एक बात और स्पष्ट है की भारत और इंडिया में फ़र्क और गहराता जा रहा है। टीवी चैनल पर बैठे प्रवक्ता पार्टी विशेष की राजनीति सस्कृति को नहीं बल्कि अपनी चाटुकरिता को प्रदर्शित करते हैं।एक बार फिर आज बिहार बँटा है। जब ये धर्म के नाम पर बँटा था तो मोदी का राजतिलक हुआ। इस बार जाति से विभक्त हुआ है और सत्ता नीतीश को हासिल हुई है। विभाजन के दोनों ही स्वरूपों में हत्या लोकंतंत्र की आत्मा की हुई है। राजनीति का मतलब येन- केन प्रकारण सत्ता हासिल करना नहीं है बल्कि समाज के आलोचनात्मक विवेक का निर्माण करना है। समाज को उस युक्ति से लैश करना जिस से वह विभिन्न कसौटिओं पर व्यवस्था को कस सके। इस से समाज के जीवन स्तर में उत्रोतर विकास होता है। आज़ादी के 68 वर्ष के बाद बेहद अफ़सोस के साथ यह कहना पड़ता है कि हिन्दुस्तान की राजनीतिक संस्कृति का एक ही उद्देश्य है – अगली बार सत्ता की तैयारी करना। जिस किसान और भूमि के मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष उत्तेजित थे उसकी चर्चा तक क्यो नही हुई? सिर्फ इसलिये क्योकि किसान वोट बैंक नही है या इसलिये क्योकि किसान बिहार मे आत्महत्या नही करता। यह कैसी विडबना है कि राजनीतिक संस्कृति मे यह चर्चा के लायक भी नही है क्योकि सबको पता है की किसान यादव है,भूमिहार है,राजपुत, कोइरी-कुर्मी है – मगर किसान नही। जातियो के आधार पर ये अलग- अलग पार्टियो के वोट बैंक है मगर सामूहिक रुप से किसान नही ।लालू जी कभी सोचिएगा की आपके बेटे आपका व्यवसाय सहर्ष स्वीकार करते है मगर किसान के बेटे किसान नही बनना चाहते है।

17वी सदी मे अंग्रेजो ने बाँटकर दासतां का मंजर दिखलाया था। क्या आज हिन्दुस्तान की राजनैतिक संस्कृति वही नही कर रही? फर्क सिर्फ सविधान का ही तो है जिसका कोई अपनी कोई आवाज नही। नित नयी व्याख्या सामने आती है।लोकतंत्र की अर्थी पर पुष्पांजलि की बारी इस बार बिहार की थी, आगे U.P, बंगाल और पंजाब भी इंतेज़ार कर रहा है। श्रीमान हमारा लोकतंत्र आज फिर हार गया।पटाखों के शोर व 56 इंच की छाती तले वह सिसक रहा है। किसी गाय का इंतेज़ार इसे भी है जिस से मोक्ष मिल सके।

[author image=”http://www.aapkatimes.com/wp-content/uploads/2015/11/Rahul-Raj-Aryan.jpg” ]Rahul Raj Aryan, a university gold medallist and a national level debater who is pursuing M.A. from Hindu College, Delhi University. Brilliant speaking and writing skills with a good command on Hindi Language.[/author]